डाक्टरी में अपने काम के प्रति ईमानदार होने के कुछ तरीके ऐसे भी होते हैं जो किसी को दिखाई नहीं देते और समझाये नहीं जाते। जैसे की –
– किसी मरीज़ को शायद बिना भर्ती के भी इलाज हो सकता है तो बिना भर्ती के ही किया जाए।
– मरीज़ को अगर 2 दिन भर्ती कर के ही काम चल जाए तो 5 दिन क्यों करना।
– अगर मरीज़ में ज़्यादा उम्मीद बाक़ी नहीं तो फालतू में उसे ना खींचना और तीमारदारों को सलाह देना की घर ले जाओ।
– अगर मरीज़ पूरी तरह ठीक नहीं हुआ तो कम से कम बिल में उसकी मदद करना।
– अगर किसी प्रोसीजर में बताए fixed पैकेज से ज़्यादा खर्च हो गया तो भी मरीज़ से पहले से बताया हुआ fixed पैकेज ही लेना।
– मरीज़ की अगर मौत हो जाए तो बकाया बिल माफ कर देना।
– मरीज़ अगर आपके महकमे का नहीं है जैसे अगर कैंसर का मरीज़ है तो उसे ख़ुद इलाज करने की कोशिश करने के बजाए सही डॉक्टर के पास जाने की सलाह देना।
– ज़्यादा बिल बनाने के बाद में discount का अहसान लादने से अच्छा पहले ही फ़ालतू के बिल ना बनने देना और बाद के डिस्काउंट के झंझट से बचना।
– पहले से अनुमान से थोड़ा खर्च बढ़ा कर ही बताना, भले ही बाद में असल खर्च कम हो तो कम लेना, बजाए इसके की पहले तो कम खर्च बताना और बाद में ज्यादा ले लेना।
ये सारी चीज़ें मैं अपनी प्रैक्टिस में करने की पूरी कोशिश करता हूँ। अगर मरीज़ को भर्ती से पहले ही जो खर्च बताया था यदि खर्च उसी के अंदर हुआ और मरीज़ स्वस्थ्य होकर घर गया तो मैं किसी के दबाव में नहीं आता।

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